सतगुरु व भगवान में अंतर
आज हम जानेंगे कि गुरु को भगवान क्यों मानना चाहिए? परमात्मा कबीर परमेस्वर जी ने कहा हैं-: गुरु गोविंद दोउ खड़े, किसके लागू पाव । बलहरी गुरु आपने, गोविंद दिया मिलाय। अर्थात:- स्वयं पूर्ण परमात्मा ने सतगुरु की महिमा बताते हुए कहा है की सतगुरु वह है जिसने सत भक्ति के द्वारा हमें पूर्ण परमात्मा की प्राप्ति व मोक्ष का मार्ग बताया ।वह हमारे लिए भगवान से भी ज्यादा आदरणीय है Santrampalji कबीर ,सतगुरु भक्ति मुक्ति के दानी ,सतगुरु बिना न छूटे खानी। सरलार्थ:- सतगुरु भक्ति कराकर मुक्ति प्रदान करते हैं वे भक्ति व मुक्ति के दाता हैं सतगुरु के बिना 4 खानी( जिसमें हम जन्मते हैं वह मरते हैं) का यह चक्र नहीं छूटता Santrampalji कबीर गुरु भक्ता मम आतम सोई। वाक़े हृदय रहूं समोई ।। अड़सठ तीर्थ भ्रम भ्रम आवे। सो फल गुरु के चरणों पावे। सरलार्थ:- परमात्मा ने स्वयं बताया है कि गुरु के भगत मेरी आत्मा है ओर जो मेरे कृपा पात्र संत को गुरु बनाए हैं मैं उनके हृदय में रहता हूं और जो शिष्य अपने गुरु से अधिक किसी अन्य संत या भगत में आस्था रखता है तो उस पशु को कोई ज्ञान नहीं है क्यो...